Thursday, July 7, 2011

AAVAHAN-14

संन्यासी के साथ आगे बढ़ाते हुए मे उसकी आपबीती के बारे मे जान रहा था..रास्ता अब बीहड़ न होके कुछ हरभरा हो गया था...संन्यासी ने दुखी और भग्न ह्रदय से अपने दुःख के बारे मे बताया..ज़ाहिर हे की वह मेरे साथ अपने कारण शरीर मे थे इस वक्त..महीनो से ये यु ही भटक रहे है. मेरे साथ आए दूसरे व्यक्ति के बारे मे मेने जाना की वह अघोर साधनाओ मे निष्णांत है. उग्र साधनाओ मे उनको ज़बरदस्त महारत हासिल है...मेने उनको एक बार फिर से देखा थोडा गौर से...सामान्य कद काठी उम्र होगी कोई ४० के आसपास या उससे भी कम, हलकी सी मुछे, कोई विशेषता नहीं लेकिन उनकी आँखे अत्यधिक लाल थि, मुझे पता चला की वह मेरे ही गुरु भाई है और उन्होंने यह सब सिद्धिया सदगुरुदेव निखिलेश्वरानंदजी से ही प्राप्त की थि. वे सद्गृहस्थ है और अपने परिवार के साथ ही रहते है. संन्यासीने कोई रास्ता बचा न देख अपने गुरु का संपर्क किया था, उनके गुरु ने श्री निखिलेश्वरानंदजी को संन्यासी की समस्या से परिचित कराया, तब निखिलेश्वरानंदजी ने मेरे साथ आ रहे इन सद्गृहस्थ को संन्यासी की समस्या सुलाजाने की आज्ञा दी थि.
अब दूर से ही कुछ नगर सा नज़र आ रहा था, संन्यासी ने एक जगह रुकते हुए कहा की अब हम कसबे की सीमा मे दाखिल होने जा रहे है. संन्यासी ने एक कदम आगे बढ़ाया जिसके साथ ही साथ मेने और मेरे साथ आए सज्जन ने भी आगे बढ़ाना उच्चित समजा. लेकिन ज्यु ही मे उस कसबे की सीमा मे दाखिल हुआ, मुझे बहोत ही अजीब सा महसूस हुआ और मे रुक गया... सन्यासी ने मेरी तरफ प्रश्न सूचक द्रष्टि से देखा..मेने कहा की मुझे कुछ अजीबसा लग रहा है...
संन्यासी ने मेरी तरफ अजीब ढंग से देखा और किंचित मुस्कराहट के साथ कहा “ क्योंकि यह तुम्हारा वास्तविक शरीर नहीं है, तुम अभी सूक्ष्म शरीर मे हो...”
हाँ...और मुझे जैसे सब कुछ समज मे आ रहा हो... सुबह जब मे उठा तो सायद एक घंटे बाद ही मुझे जोरो से चक्कर आया था और अचानक अपने बिस्तर पर गिर पड़ा था, उसके बाद मेने अपने आपको उस पथरीले मैदान पर पाया, मेरा निश्चित दिशा की तरफ जाना, असामान्य गति, सज्जन से मूक वार्तालाप, मनोभाव...तो मे अपने सूक्ष्म शरीर मे हू? लेकिन अगर मे यहाँ पे आया भी तो कैसे ?
यही सब सोच रहा था की अचानक से संन्यासी ने मेरे मनोभाव को पढाते हुए मुझे कहा की मुझे अपने गुरु से आप दोनों को यहाँ बुलाने की आज्ञा मिली थि, इन सज्जन को मेने पहले ही बुला लिया था, आपके सूक्ष्म शरीर का मेने आवाहन किया है...जब सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर विलीन होता है तो वह सम्पूर्ण देह मे, विभ्भिन शरीर मे भी प्राण एवं आत्मउर्जा रहती ही है..आवाहन के माध्यम से आपके सूक्ष्म शरीर को मेने यहाँ पे खिंच लिया है, आवाहन का अर्थ ही होता है बुलाना, अपनी और खींचना, आकर्षित करना...
आवाहन के इस पक्ष के बारे मे मेने कभी सुना भी नहीं था की किसी को भी किसीभी शरीर मे आवाहित किया जा सकता है...सचमे ज्ञान असिमित है...लेकिन फिर मे सोच मे पड गया की मेरा यहाँ आने का उद्देश्य क्या होगा? तब उस सज्जन महोदय ने कहा की वो मे तुम्हे समय आने पर बता दूँगा फिलहाल हमें चलना चाहिए...इसी के साथ हम उस कसबे की और चल पड़े..संन्यासी निश्चित गति से आगे बढ़ाते जा रहे थे और हम कुछ पीछे पीछे संन्यासी के कदमो पर बढे जा रहे थे. कसबे मे इधर उधर कुछ लोग थे जो की सायद हमें देख नहीं सकते थे क्यूँ की हम अपने वास्तविक शरीर मे नहीं थे...आगे मेने देखा की संन्यासी ने योगिनी की जिस जगह का जिक्र किया था कुछ उसी प्रकार की जगह हमें दिखाई दी...कुछ ही दुरी पर वह मकान और थोडा अलग सट कर थोड़ी ऊंचाई पर एक कमरा... हम २५-३० कदम दूर रुक गए...संन्यासी ने मुझसे कहा की अब तुम्हे यह सूक्ष्म शरीर छोड़ना होगा और कारण शरीर मे आना होगा...मेने आश्चर्य से सन्यासी के सामने देखा...और पूछा की कैसे ? सन्यासी ने उत्तर दिया संभव है, आवाहन से...
While walking with sanyasi, I came to know about his story of sufferings…now the way was not so stony but was a bit green. Sanyasi told me about his sufferings with sorrow and heavy heart…obviously, at present he was in his Kaaran Sharir with me, he is wondering like this from months. About another person accompanying me, I came to know that he is component in Aghor sadhanas. In ugra sadhana he holds a big command. I looked at him one more time with concentration this time…with average built, about 40 or less in age of him, slight mustache, nothing special; but eyes were blood red. I came to know that he is my gurubrother and all his accomplishments, he received from Sadgurudev Nikhileshwaranad. He lives his material life with family. When sanyasi found no other way at that time he contacted his Guruji, His guru informed about trouble of sanyasi to Shri Nikhileshwaranadji, at that time Nikhileshwaranandji ordered gentleman, accompanying me, to solve the problem of sanyasi.

Now, from far though, a village was visible, stopping himself at one place, sanyasi told that we are about to enter in border of the village. Sanyasi step forwarded so we even thought to better walk. But at the moment I entered in the border of the village, I felt very strange and mysterious and I stopped…sanyasi looked at me puzzled… I told that I was feeling strange…

Sanyasi looked at me very mystic way and with a smile he said “Because this is not your actual body, you are currently in your astral body (sukshm sharir)”

Yes, and now I was like understanding everything…when I woke up in the morning, within one hour I got giddiness and I fall down on my bed, after that I found myself on the rocky ground, my walk towards particular direction, abnormal speed, silent conversation with gentleman, mental position…so I am in my Sukshm sharir?!! But how did I reach here?
I was wondering all these at that time suddenly reading my mind sanyasi told me that I was ordered by my guruji to call both of you here, I had already called this gentleman and I did Avahan on your sukshm sharer, when astral body is merged with your actual body in that condition in your ‘Deh’ containing various bodies will have the equal amount of Praan and aatm energy..With Avahan, I drawn your astral body here, the meaning of aavahan itself is to call, to drawn towards us, to attract…
I had never heard about this side of aavahan that one can call anyone in his anybody...Really, knowledge is infinite…but then I wondered about my objective to be here? At that time gentleman told that he will tell me when the right time will come but at present we are suppose to move ahead…With this we started in towards that village, sanyasi was moving ahead with specific speed and we were following him behind. There were few people in village who weren’t possibly watching us as we were not in our actual bodies…a bit ahead I guessed a place which was looking almost alike sanyasi described me about yogini’s place. A bit far only that house and little far attached room on height…We stopped at about 25-30 steps.  sanyasi told me that ‘you are suppose to leave your sukshm sharir now and have to form Kaaran sharir ‘  I looked with surprise at sanyasi and asked him how…sanyasi answered possible through aavahan.
****NPRU****

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